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उपहार सिनेमा की वो उदासी! ‪#‎दरबदरदिल्ली‬

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चारों तरफ कॉर्पोरेट ऑफिस और फूड जॉइंट से घिरे होने के बावज़ूद उपहार सिनेमा कंपाउंड की उदासी ज्यों की त्यों बनी हुई है.

सिनेमा हाल की मेन गेट पर कभी दर्शकों का कभी रेला रहा करता होगा, खुली चाय की दूकान पर पांच लोग भी नहीं होंगे. बाहर की ये उदासी अंदर कॉर्पोरेट ऑफिसों तक में मौज़ूद थी…जिनमे से एक में तो अपने काम से गया और एक दो में वाशरूम और यूँ किसी बहाने से. ऐसा लग रहा था मातम 18 का होकर वयस्क होकर यहाँ तैनात है. एस पी सिंह इस बीच लगातार याद आते रहे.

उपहार अग्निकांड में जिन निर्दोष लोगों की जानें गयीं,उनकी याद में एक छोटा सा उद्यान बना है. भीतर जाने पर मांदल की डिज़ाइन में काले पत्थर पर उनके नाम लिखे हैं. नज़दीक जाने से पहले चप्पल उतारने के निर्देश लिखे थे. मैंने चप्पल उतारकर जैसे ही सबके नाम पढ़ने शुरू किए, उदास दुपहरी में घास पर सुस्ता रहे उस बुजुर्ग से रहा नहीं गया और आकर पूछ बैठे- बेटा, तुम्हारे भी कोई अपने मरे हैं..मैंने बस इतना ही कहा-

नहीं अंकल..कोई नहीं, बस ऐसे ही इधर आ गया 14 साल से दिल्ली में रहते हुए कभी आया नहीं तो..नहीं आप जिस तरह से नाम पढ़ रहे थे तो मुझे लगा..अंकल सच बात तो ये है कि बिना किसी मतलब के एक साथ इतने सारे इंसान के मरने से वो परिवेश भी मर जाता है. 

यहाँ आकर इस परिवेश में थोडा मैं भी मर गया…और कुछ नहीं..परिवेश को ज़िंदा होने में सालों लग जाते हैं..देखिए,कॉर्पोरेट के यही ऑफिस टीवी, रेडियो और मॉल्स में जितने चहकते हैं,यहाँ बुत्त बने हैं..…बाहर निकला,ग्रीन पार्क की वही चमक,वही चहल-पहल..पता नहीं क्यों निकलते वक़्त लगा कि मेरे जीवन जो भी सबसे प्रिय होंगे,उन्हें अपने साथ ये जगह ज़रूर लाऊंगा..

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