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इंदिरा जी क्यों याद करें आपको?

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किसी भी व्यक्ति की मृत्यु को याद करने का सही मौका उसका जन्मदिन कतई नहीं होता है। लेकिन स्मृतियां मौको की मोहताज कहां होती हैं? इंदिरा गांधी का जिक्र जब भी आता है, मेरे जेहन में उनसे जुड़ी सबसे प्रबल स्मृति कौंधती है और वो है, उनकी हत्या। मैं कक्षा सात का छात्र था। अपने भाई और दोस्तो के साथ घर से कुछ दूर क्रिकेट खेलने गया था। भाई ने एक ऐसा शॉट लगाया कि गेंद गुम हो गई। बैटिंग ना मिलने का मलाल लिये वापस लौट रहा था। रास्ते में हमने लोगो को जगह-जगह काले झंडे लगाते और दुकाने के शटर गिरवाते देखे। फिर पता चला कि इंदिरा गांधी की हत्या हो गई है। देखते-देखते सबकुछ बंद हो गया। वैसी भयानक मनहूसियत मैने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखी थी। सुबह जब आंख खुली तो मौत का सन्नाटा क्रूर कोलहाल में बदल चुका था। भारत के कई शहरों की तरह रांची में भी लूटपाट शुरू हो चुकी थी। हमारा घर एक ऐसी सड़क पर था, जो एक बड़े व्यवसायिक इलाके को कई रिहाइशी इलाको से जोड़ती थी। अपने घर के बाहर खड़े पूरे दिन लूट के सामान की ढुलाई का नज़ारा देखते रहे। खिलौने, कपड़े, मोटर पार्ट्स और जूते-चप्पल तक, जिसके हाथ जो आया वो लेकर खुशी-खुशी अपने घर लौट रहा था।

प्रोफेशनल लुटेरा कोई नहीं लग रहा था, लेकिन सबकी आंखों में एक अजीब सी उत्सवधर्मी चमक थी। शाम होते-होते रांची के आसमान में काले धुंए भी उठने लगे। मेन रोड और अपर बाज़ार में सिखों की कुछ दुकानें जला दी गई थीं। कर्फ्यू लगा दिया गया और सेना बुला ली गई। रांची में टीवी नया-नया आया था। इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के अगले दिन रांची एक्सप्रेस ने ख़बर छापी कि पड़ोसी के घर टीवी देखने जा रहे 13 साल के एक बच्चे को आर्मी वालो ने सिर पर गोली मार दी और उसकी बीच सड़क मौत गई। इंदिरा जी की विरासत मेरा पहला साक्षात्कार यही था।

इंदिरा गांधी को गये 30 साल हो चुके हैं। उनकी मृत्यु के बाद भारत में जो कुछ हुआ उसका जख्म अब भी हज़ारो लोगों को बेइंतहा तकलीफ देता है। अक्सर ये कहा जाता है कि सिख विरोधी दंगों को भूल जाना चाहिए, क्योंकि उसका इंदिरा गांधी से कोई लेना-देना नहीं था। इंदिरा जी देश को एक नई दिशा देनेवाली एक बेहद ताकतवर राजनेता थी। भारत के लिए उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मैं भी उन बच्चो में था, जो इंदिरा गांधी की जादुई शख्सियत की अनगिनत कहानियां सुनकर बड़े हुए थे। लेकिन अब सोचता हूं तो लगता है कि क्या इंदिरा जी ने वाकई कुछ ऐसा किया था कि देश को उनका ऋणी होना चाहिए? कांग्रेस तोड़कर और अपने नाम पर पार्टी बनाकर व्यक्तिवादी राजनीति का प्रतिमान इस देश में इंदिरा गांधी ने ही गढ़ा। जिस लोकतंत्र के लिए देश ने लंबी लड़ाई लड़ी, उस लोकतंत्र का अपहरण इंदिरा जी ने किया। लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाने के लिए इंदिरा जी ने भी बाकी दुनिया के तानाशाहों की तरह तमाम तरीके के वीभत्स हथकंडे अपनाये। खुद को राष्ट्रवादी और राजनीतिक विरोधियों को देशद्रोही साबित करने की फासिस्ट परंपरा का सूत्रपात भारत में इंदिरा गांधी ने किया।

नेहरू ने जिन लोकतांत्रिक और वैधानिक संस्थाओं को मजबूत किया था, इंदिरा गांधी ने उसे सुनोयोजित ढंग से कमज़ोर किया। चमचागीरी को शास्त्रीय भारतीय राजनीतिक परंपरा बनाने का श्रेय भी इंदिरा जी को जाता है। देश के लिए इंदिरा गांधी का सबसे अविस्मरणीय योगदान वशंवाद को भारतीय राजनीति के केंद्र में स्थापित करना है। जो लोग वंशवाद के लिए नेहरू को दोषी ठहराते हैं, वे पूरी तरह सही नहीं हैं। नेहरू ने कभी इंदिरा गांधी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था। लेकिन इंदिरा गांधी बहुत व्यवस्थित तरीके से ऐसा किया और खामियाजा पूरा देश आजतक भुगत रहा है। मूल्यों पर आधारित कांग्रेस पार्टी का अपहरण करके उसे एक पारिवारिक जेबी संस्था बनाने का अपराध पूरी तरह इंदिरा जी के खाते में जाता है।

प्रशंसकों को ये बातें कड़वी लग सकती हैं। 1971 की लड़ाई, प्रीवी पर्स का खात्मा, पोकरण परीक्षण और बैंको राष्ट्रीयकरण, ये चार बड़ी चीज़ें इंदिरा गांधी के खाते में बताई जाती हैं। मुझे लगता है कि कई घटनाएं इतिहास की निरंतरता का परिणाम होती हैं और व्यक्ति सिर्फ कारक होता है। क्या इंदिरा गांधी की जगह कोई और प्रधानमंत्री होता तो 1971 की लड़ाई का नतीजा कुछ अलग होता? क्या कोई और प्रधानमंत्री होता तो उस परमाणु कार्यक्रम को बंद कर देता, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा के वक्त ही शुरू हो चुका था। अपनी तथाकथित राष्ट्रवादी नीतियों की वजह से कई विरोधी तक इंदिरा जी के मुरीद रहे हैं। बेशक इंदिरा जी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए स्वर्ण मंदिर में सेना भेजी हो, लेकिन ये कोई कैसे भूल सकता है कि पंजाब समस्या भी उन्ही की खड़ी की हुई थी। इंदिरा जी भले ही भारतीय राजनीति की एक चमकदार शख्सियत थी, लेकिन मैं उन्हे सिर्फ एक ऐतिहासिक पात्र के रूप में देख पाता हूं।

एक ऐसी किरदार जिनपर किताबें पढ़ना और फिल्में देखना मुझे पसंद है। लेकिन उनकी राजनीतिक कार्यशैली और विरासत से मुझे नफरत है। लोकतांत्रिक भारत में वो दिन दोबारा कभी लौटकर ना आये जो इंदिरा जी ने दिखाये थे। उनके जन्मदिन पर बस यही कामना है।

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