Corruption Democracy

आ गले लग जा

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फलर, अरविंद केजरीवाल के गले में जाने कब से पड़ा था। अब एक और चीज उनके गले पड़ गई है- नाम है, लालू प्रसाद यादव।

मफलर को केजरीवाल ने खुद गले लगाया था, लेकिन लालूजी का केस कुछ अलग है। केजरीवाल चीख-चीखकर कह रहे हैं.. मैंने लालूजी को गले नहीं लगाया, बल्कि उन्होंने जबरन गलबहियां डाल दीं। लेकिन पब्लिक मानने को तैयार नहीं है।

गलबहियों का यह उत्सव पटना में नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हुआ। शपथ ग्रहण क्या था, विपक्षियों की पूरी बारात थी। समधी वाले ठाठ से लालूजी आगे-आगे चल रहे थे। पीछे-पीछे नाचते कई राज्यों के बड़े नेता थे। जश्न था और नरेन्द्र मोदी के लिए ललकार भी थी।

बारात की शोभा बढ़ाने के लिए केजरीवाल खासतौर से दिल्ली से बुलाए गए थे। अपना मोल पहचानकर केजरी बाबू भी उसी टशन में थे, जिस टशन में यूपी-बिहार की बारातों में सहबाला होता है। दूल्हे के एकदम साथ-साथ, हर जगह चिपका हुआ। ईमानदार दूल्हा, ईमानदार सहबाला। लोग टीवी पर ही काला टीका लगाकर इस जोड़ी की नजर उतारने में जुट गए थे।

सुशासन बाबू के बारात की शोभा देखते ही बन रही थी। लेकिन तभी हो गया, एक खेल। अपने दोनों लाल की ताजपोशी से निहाल लालूजी मंच पर घूम-घूमकर बधाइयां बटोर रहे थे। अचानक उन्होंने केजरीवाल का हाथ पकड़ा, हाथ हवा में उठाकर जनता से अभिवादन करवाया और फिर गले लगा लिया।

enter बिहार चुनाव कुछ और करे ना करे, एक चीजे तो जरूर साबित कर गया। वह यह कि जब तक इस देश में मौजूदा शैली की राजनीति है, तब तक जनता के लिए निशुल्क मनोरंजन की पूरी गारंटी है।

ईमानदारी लालूजी के सीने से चिपकी थी और केजरी बाबू को डर सता रहा था कि भ्रष्टाचार परमानेंटली उनके गले से ना लिपट जाए। केजरी बाबू छटपटा रहे थे, लेकिन लालूजी ने उन्हें एकदम बे-चारा कर दिया था। जनता तालियां पीट रही थी और केजरी बाबू ‘काहे मोह छेड़-छेड़ गरवा लगाये’ वाली भंगिमा में खड़े शरमा रहे थे।

रात गई, बात गई वाले अंदाज में बात खत्म हो जाती। लेकिन बुरा हो दिल्ली भाजपा वालों का। जगह-जगह केजरीवाल-लालू की नई दोस्ती पर बड़े-बड़े पोस्टर लगवा दिए। अब मजबूरी ये हो गई है कि केजरीवाल को घूम-घूमकर कहना पड़ रहा है.. मैं तो नीतीश कुमार के साथ खड़ा था। लालूजी ने जबरदस्ती अपनी तरफ खींच लिया तो क्या करता.. मजबूर था जी मैं तो।

‘गले लगना’, ‘गले लगाना’ और ‘गले पड़ना’ और ‘गला छुड़ाना’ ये सब राजनीतिक मजबूरियों के नाम हैं। भारत के नेताओं की खासियत यह है कि वे हर मजबूरी को एक नायाब आर्ट बना देते हैं। बिहार के पूरे चुनाव के दौरान इस आर्ट का भरपूर प्रदर्शन हुआ।

कांग्रेस हो या बीजेपी, आरजेडी हो या जेडीयू। हर पार्टी के पास अपनी एक सशक्त विचारधारा थी। हर पार्टी अपनी विचारधारा के साथ मजबूती से खड़ी थी। लेकिन कई जगहों पर धारा का प्रवाह इतना तेज था कि सारे विचार उसी में बह गए। विचारों के बहने का लाभ ये हुआ कि चुनावी मंझधार में खड़ी पार्टियों के बीच का बंधन और मजबूत हो गया। इतिहास से परे, पुरानी दुश्मनियों को ताक पर रखकर पार्टियां डटी रहीं।

नीतीश कुमार को खुश करने के लिए लालू यादव मुर्दाबाद के नारे लगाते अघोरी बाबा का वीडियो आया। अघोरी बाबा नीतीश को बार-बार गले लगा रहे थे और लालू यादव मुर्दाबाद कह रहे थे। लेकिन रौद्र रस के धनी लालू यादव एकदम शांत रहे, नीतीश के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा, क्योंकि गर्दन बचाने की मजबूरी थी।

इमरजेंसी लालू जी के जीवन की इतनी बड़ी घटना है कि उन्होंने अपनी पहली संतान का नाम उस कानूनी धारा के नाम पर रखा है, जिसके तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था—’मीसा’। नीतीश कुमार भी इमरजेंसी के दौरान हुए छात्र आंदोलन में शामिल थे। लेकिन इमरजेंसी लगाने वाली कांग्रेस बिहार में ‘फासिज्म’ के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई में लालू-नीतीश के हाथ मजबूत कर रही थी

राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं है। केजरीवाल भले ही खंडन करें, लेकिन सयानी जनता लालू यादव के साथ उनकी गलबहियों में भावी राजनीति के संकेत ढूंढ़ चुकी है। वह जानती है कि वोट की खातिर इस देश के नेता कुछ भी कर सकते हैं।

लालू और नीतीश ने राहुल बाबा के साथ मंच साझा करने तक से मना कर दिया, लेकिन अपमान का हलाहल गले उतारकर भी राहुल बिहार में डटे रहे। अपमान पचाने के बदले उन्हें 27 सीटों पर जीत का इनाम मिला और साथ ही यह महान ज्ञान कि राजनीति में सफलता मान-सम्मान से ऊपर उठे बिना नहीं मिलती।

राजनीति का कोई हुनर बिहार के चुनाव में छूटा नहीं। टोकरा भरकर भाषण, बोरी भरकर वायदे, बेतुके बयान और बिंदास गालियां आप जिन चीज़ों की कल्पना कर सकते हैं, वे सब बिहार के चुनाव में नजर आई। बहुत कुछ कल्पना से परे भी था, खासकर मुद्दे।

महागठबंधन अपने प्रचार के दौरान इस बात को लेकर नाराजगी जताता रहा कि आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता की उपेक्षा इस चुनाव में क्यों की जा रही है। दूसरी तरफ एनडीए ने नीतीश कुमार के हाथों जीतन राम मांझी के अपमान को बड़ा मुद्दा बनाया। हर पार्टी दूसरों की ‘भलाई’ की चिंता में घुल रही थी।

बीजेपी की सबसे पुरानी पार्टनर शिवसेना, बीजेपी का वोट काटने खासतौर पर बिहार में उतरी। असदउद्दीन ओवैसी की घोषित लड़ाई बीजेपी से थी, लेकिन उन्होंने वोट महागठबंधन के काटे। मुलायम सिंह यादव बिहार क्यों आए? ये किसी की समझ में नहीं आया।

बिहार चुनाव कुछ और करे ना करे, दो चीजें जरूर साबित कर गया। पहली बात यह कि जब तक इस देश में मौजूदा शैली की राजनीति है, तब तक जनता के लिए निशुल्क मनोरंजन की पूरी गारंटी है। दूसरी बात यह कि राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं है। केजरीवाल भले ही खंडन करें, लेकिन सयानी जनता लालू यादव के साथ उनकी गलबहियों में भावी राजनीति के संकेत ढूंढ़ चुकी है।

केजरीवाल को गले लगाना लालू की मजबूरी थी और गले लग जाना केजरीवाल की मजबूरी। लेकिन मजबूरियों की अनगिनत दास्तां देख चुकी जनता जानती है कि वोट की खातिर इस देश के नेता कुछ भी कर सकते हैं।

अब तक मजाक में यह कहा जाता था कि देश वो दिन भी देखेगा जब कांग्रेस और बीजेपी तक आपस में हाथ मिला लेंगी। मैं भी इसे मजाक मानता आया था, लेकिन इस बीच अचानक ख़बर आ गई है.. सिक्किम के चुनाव में एसडीएफ को हराने के लिए बीजेपी कुछ भी करने को तैयार है और कांग्रेस ने उसके सामने प्रस्ताव रख दिया है–  ‘आ गले लग जा’।

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