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आशु के आंसू, सोशल मीडिया की हंसी

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आशुतोष जी रो रहे है। सोशल मीडिया हंस रहा है। आंसू और मुस्कान के इस सार्वजनिक समारोह की सबसे उल्लेखनीय बात यही है कि लोग अब किसी भी बात को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं। ना अविरल आंसुओ को और ना ही सार्वजनिक माफी को। संवेदनाएं इतनी कुंद हो चुकी है कि गजेंद्र की मौत जैसी ख़बरों की अहमियत भी अल्पकालिक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं है।

तमाशा तंत्र ने ही गजेंद्र की जान ली है, ये बात उसकी बेटी के बयानों से स्पष्ट हो चुका है। उसका इरादा आत्महत्या करने का नहीं था, वो तो सिर्फ टीवी पर आना चाहता था। गजेंद्र को देश के किसी और तंत्र से ज्यादा भरोसा तमाशा तंत्र पर था। उसे पता था कि सारे तंत्र नाकाम हो चुके हैं, सिर्फ तमाशा तंत्र अपना काम कर रहा है। आखिर कौन है, इन सबका जिम्मेदार? देश में किन लोगो ने इस तमाशा तंत्र को खाद-पानी दिया है? आशुतोष जी के साथ मैने लंबे अरसे तक काम किया है, लेकिन ये दावा नहीं कर सकता कि मैं उन्हे ठीक से समझता हूं। इतना ज़रूर याद कर सकता हूं कि वो नवजोत सिंह सिद्धू मार्का ठहाके और राखी सावंत जैसी रुलाई की अहमियत औरो के मुकाबले ज्यादा बेहतर तरीके से समझते थे और ऐसे किसी भी मौके का ठीक से ना भुनाया जाना उन्हे नाकाबिल- ए-बर्दाश्त था।

आज आशुतोष जी रो-रोकर गजेंद्र की मौत का तमाशा ना बनाये जाने की दुहाई दे रहे हैं। अगर गजेंद्र मरा नहीं होता तो आम आदमी पार्टी को रैलियों में रंग जमाने वाला एक एंटरटेनिंग कैरेक्टर मिल गया होता, इस सच से भला कौन इनकार कर सकता है।

देश के नंबर वन स्वयंभू अराजक अरविंद केजरीवाल किस कदर तमाशापरस्त हैं, ये सबको पता है। मीडिया का एक औजार के रूप में आम आदमी पार्टी ने बेहद चालाकी से इस्तेमाल है और जब भी दांव उल्टा पड़ा है, तो `सब मिले हुए हैं, जी’ की जानी-पहचानी चीख पुकार मचाई है। क्या आम आदमी पार्टी के नेता अपना दोहरा चरित्र छोड़ने को तैयार हैं। अब ऐसा संभव नहीं लगता क्योंकि एक आशावादी आंदोलन का एक ऐसे मौकापरस्त राजनीतिक दल के रूप में पूर्ण रूपांतरण हो चुका है, जिसे पॉपुलिस्ट पॉलिटिक्स के सिवा कुछ भी नहीं आता है।

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