Poetry

आरजू (शेर )

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यह जिंदगी भी अजीब है यारो,

कभी जीता हूँ तो कभी मरता हूँ ।

यह जीना भी क्या जीना है यारो,

न जीता हूँ और न मरता हूँ ।

 

कई मर्तबा मरने को कदम बढ़ायें हैं मैंने,

यह सोचकर कि कोई आकर मुझे बचा लेगा ।

अनेक अरमान भी पाले थे मैंने,

पर क्या पता था कि कोई मुझे सजा देगा ।

 

सिर्फ मैं ही नहीं हूँ तमाम हैं मेरे जैसे,

जो न जीते हैं और न मरते हैं ।

जिन्हें जिंदगी नर्क से बदतर लगती है,

फिर भी वे सौ बरस जीने की आरजू रखते हैं ।

 

प्यार मुहब्बत की बात करते हैं वो,

पर प्यार-मुहब्बत ही भक्षण करते है ।

दुनिया को जन्नत बनाने वाले,

बस नफरत की आग उगलते है ।

 

वे कहते हैं कि दुनियां में बस,

खुदा का ही हुक्म चला करता है ।

तक़दीर में जिसके जो होता है लिखा,

उसको बस उतना ही मिला करता है ।

 

इबादतकर खुदा से कि वह,

तेरे गुनाहों को मांफ कर दे ।

आये कयामत जब तो, तुझे,

दोजख की जगह जन्नत में घर दे ।

 

दी दारे जनाब का, मयस्सर होता नहीं है अब,

खुदा जाने कैसे, उनका आज कदम पड़ गया है ।

आना न आना, यह तो ऊपर है जनाब के,

हमने तो दरवाजा अपना, उनको खुला कर दिया है ।

 

इस जालिम मुस्कराहट को तो देखो,

जो खुलकर उनको, हंसने भी न देती है ।

फेर लेते हैं वो, अपनी निगाहें जो हमसे,

हमको जीने भी न देती हैं, मरने भी न देती हैं ।

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