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आरक्षण नीति की समीक्षा का औचित्य

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आरक्षण नीति की समीक्षा अथवा आरक्षण समाप्त करने की पहल:

आर०एस० एस० के संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत ने देश में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने के लिए गैर राजनैतिक समिति बनाने की पहल की है| सीधे तौर पर कहा जाये तो उन्होनें अस्पष्ट रूप में आरक्षण को समाप्त करने की तरफ इशारा किया है| भारतीय जनता पार्टी और कॉंग्रेस के कुछ नेताओं के द्वारा भी कहा गया है कि अब वक़्त आ गया है कि जाति व धर्म के आधार पर दिए जा रहे आरक्षण पर विचार करने की आवस्यकता है| धर्म व जाति के स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था दिए जाने पर विचार किया जाना चाहिए| जहाँ तक जाति व धर्म के आधार पर आरक्षण न दिए जाने की बात कही गई है तो यह स्पष्ट किया जाना ज़रूरी है की आरक्षण धर्म के नाम पर नहीं दिया जा रहा है| यह हज़ारों सालों से सामाजिक तौर से दबाए गये तथा कुचले गये एवं आर्थिक व राजनैतिक अधिकारों से वंचित किए गये लोगों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था है| यह व्यवस्था तब तक समाप्त नहीं की जा सकती जब तक ये वंचित लोग सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से समानता के स्तर तक नहीं आ जाते| फिर भी यदि जाति,धर्म के नाम पर दिए जा रहे आरक्षण को समाप्त कर आर्थिक आधार पर दिए जाने की बात कही जा रही है तो हम सब भी इसका दिल से समर्थन करते हैं बशर्ते:

विकल्प नं०१–देश से जाति व धर्म का नामो-निशान मिटा दिया जाये| कोई भी व्यक्ति अपने नाम के आगे अथवा पीछे ऐसे शब्दों का प्रयोग न करे जिनसे किसी जाति अथवा धर्म का बोध होता हो| किसी से भी स्कूल में दाखिले के समय तथा नोंकरी के लिए आवेदन करते समय उसकी जाति व धर्म न पूछा जाये| फिर जैसा कि कहा जा रहा है कि आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को (आर्थिक आधार पर ) आरक्षण दिया जाये| बिल्कुल सही बात है| ऐसी मानवतावादी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जो जाति, धर्म से दूर हो और जिसमें तथाकथित ईश्वर का कोई हस्तक्षेप न हो| धर्म तो एक व्यक्तिगत आस्था का विषय है इसे सामाजिक संस्था नहीं बनाया जाना चाहिए| फिर लोगों को हर क्षेत्र में समानता के स्तर तक ( चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो अथवा राजनैतिक ) लाने के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण नीति की व्यस्था की जाये| इसके साथ यह भी आवस्यक है कि सभी को निःशुल्क व समान स्तर की शिक्षा दी जाये| शिक्षा व खाने-पीने एवं रहन-सहन का पूरा खर्च सरकार वहन करे|

विकल्प नं०२– देश में ऐसी व्यस्था कायम की जाये जिसमें हज़ारों सालों से चला आ रहा कुछ लोगों का हर क्षेत्र में १००% आरक्षण समाप्त हो जाये| सबको न्याय मिल सके इसके लिए हर जाति अथवा वर्ग के व्यक्ति को उसकी जनसंख्या के अनुपात में हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व दे दिया जाये जिसकी कि बहुत आवस्यकता है|

देश के सभी एस० सी०/ एस० टी०, ओ० बी० सी० तथा अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्प-संख्यक लोगों से आशा है कि उपरोक्त बातों पर वे सहानुभूति पूर्वक विचार करेंगे और ऐसी व्यवस्था कायम कराने में मदद करेंगे ताकि सभी को न्याय मिल सके| वर्तमान व्यवस्था में काफ़ी कमियां हैं जिन्हें दूर करने की आवस्यकता है|

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