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आम जनता के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन प्रतिभागिता शुल्क मात्र पांच हजार रु:

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चूंकि यह आयोजन भोपाल में हो रहा है, अतः नित्य की छोटी बड़ी सूचनाएं और समाचारों को मैं फालो करता रहा हूँ.

तो मोटा-मोटी बात यह है –
अब तक (और आगे भी, चाहे सरकारें कोई भी, कैसी भी रहें) यह और इस तरह के आयोजन अशोक चक्रधरों और अशोक बाजपेयीयों जैसे चन्द लोगों के हाथों में ही रहेंगे, और उनके ही फालोअर बुलाए जाएंगे.
आम जनता के लिए 5000 रुपए का पंजीकरण अनिवार्य था, तो जनता ने बहिष्कार कर दिया. मैंने भी कर दिया. अनुमान था कि (कैपिंग थी 3000 की, प्रथम आओ प्रथम पाओ के तर्ज पर) लोग टूट पड़ेंगे, परंतु आवेद आए केवल 1200 के आसपास – उनमें भी अधिकांश थे अपनी किताबों के विमोचन करवाने वाले साहित्यकार, परंतु किताब विमोचन का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया तो लोग बिलबिला रहे हैं अलग क्योंकि यह नॉन रिफंडेबल था.
तो, भीड़ बढ़ाने के लिए तत्काल ही तोड़ निकाला गया. चूंकि आयोजन मप्र में हो रहा है (मप्र के बाबू लोग जी जान से लगे हैं भोपाल को सजाने धजाने ) तो मप्र के सभी कलेक्टरों को संदेश भेजा गया कि वे अपने अपने जिलों से 50 हिन्दी सेवियों को सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजें. परंतु यहाँ शर्त थी कि उन्हें अपने हर्जे खर्चे से सम्मेलन में आना होगा.

कलेक्टरों ने मातहतों को सर्कुलर जारी कर दिया और जो जिसे बन पड़ा अपनी जिलेवार सूची बना कर भेज दी. एक सूची किसी ने अपने फ़ेसबुक पर टांगी है जिसमें आमंत्रितों के योग्यता के खंड में साहित्य में रुचि दिखाई गई है.

बाबू लोग जो न कर लें, कम ही है!

और हाँ, बताता चलूं कि मैं भी आमंत्रित नहीं हूँ, जबकि मैंने उनके संपर्क सूत्र में बाकायदा एक सत्र लेने के लिए प्रस्ताव पावरपाइंट समेत भेजा था. पर, जैसा कि आम होता है, किसी ने शायद वह ईमेल खाता खोलकर देखा ही नहीं होगा.

रवि रतलामी

( विदेश राज्यमंत्री जनरल वी.के.सिंह के नाम लिखी चिठ्ठी पढ़ने के बाद रवि रतलामी ने कुछ नई जानकारी हम तक प्रेषित की है..)

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