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आप अपने देवी-देवताओं, आराध्य को आखिर क्यों नहीं देखना चाहते?


दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में जब पहुंचा तो घुप्प अंधेरे में भी अंदाजा लग गया कि बैठने की कहीं कोई सीट नहीं बची है. पीछे दीवार से टिकने की कोशिश की तो वहां लोग पहले से ही एक पर एक लदकर-झुककर खड़े थे.

दिल्ली की इस भारी उमस भरी गर्मी में भी यहां लोग पंखें के बूते करीब ढाई घंटे तक जमे रहे. नकुल(Nakul Singh Sawhney) की बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म “मुजफ्फरनगर अभी बाकी है” के प्रदर्शन के दौरान पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में जिस तरह एवीबीपी के कार्यकर्ताओं ने तोड़-फोड़ मचायी थी और फिल्म को बीच में ही रोक दिया था, ये उसके प्रतिरोध में रचनात्मक कार्रवाई थी. दिल्ली सहित देश के अलग-अलग हिस्से में सौ से अधिक जगहों पर ये स्क्रीनिंग कला-सिनेमा-अभिव्यक्ति के पक्ष में और बर्बर रवैये के प्रतिरोध में की गई थी. सोशल मीडिया पर अलग-अलग शहरों-कस्बों से इसकी तस्वीरें साझा कर रहे हैं.

जिस दिन इस फिल्म का प्रदर्शन रोका गया था, हम जैसे लोग जो कला और सिनेमा की कंटेंट के प्रति राय कायम करने से पहले उस विधा के प्रति वाजिब सम्मान रखते हैं और उसके लोगों तक पहुंचने की इच्छा रखते हैं, जान-सुनकर धक्का लगा था. अफसोस हुआ कि आखिर हम किस लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां आप फिल्म का प्रदर्शन तक नहीं कर सकते. आज भी हमें शुभ्रदीप की पहली बरसी पर उनकी बनाई फिल्म बहुत ही कम लोगों के बीच देखनी पड़ी. हम इस फिल्म को लेकर बहुत प्रचार-प्रसार नहीं कर सके. लेकिन

जब हमने गांधी शांति प्रतिष्ठान का ये नजारा देखा तो लोकतंत्र के दूसरे हिस्से के बचे रहने की उम्मीद बनी रही. ये लोकतंत्र जो तथाकथित बहुमत के लोकतंत्र जैसा शक्तिशाली तो नहीं है लेकिन विवेक की जमीन पहले की तरह ही मौजूद है. शायद यही कारण है कि नकुल की जिस फिल्म को लोगों ने प्रदर्शित होने नहीं दिया, उस फिल्म उनके आराध्य, देवी-देवताओं के वक्तव्य ज्यादा हैं जो इंसानी रूप में अक्सर उनके बीच रैलियों, शाखाओं, बौद्धिक में मौजूद रहते हैं. आप भी जब इस फिल्म को देखेंगे तो इस सिरे से सोचना शुरु करेंगे कि आखिर जिनकी शह पर, जिनके बताए रास्ते पर ये कार्यकर्ता काम करते हैं, वो जब पब्लिकली बात करते हैं, सिनेमा उसे शामिल करता है तो उन्हें सुनना क्यों पसंद नहीं करते ?

बहरहाल, प्रतिरोध के लिए नकुल, उनकी और प्रतिरोध की टीम ने जिस रचनात्मक रास्ते को चुना, वो ये बताने के लिए काफी है कि इस देश में अभिव्यक्ति के तरीके बदल सकते हैं, बंद नहीं हो सकते.

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