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आतंकी तत्वों को रोकने के लिए एक-जुट होना पड़ेगा

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हाल ही मे अमेरिका के लास वेगस (एल. वी.) मे एक आतंकवादी ने आम जनता पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। हालांकि आतंकवादी ने इस घिनौने काम के बाद ख़ुदकुशी कर ली, दुखद रूप से डर और आतंक फैलाने के अपने मंसूबे मे वो कामयाब हुआ। सरकारी सूत्रों के अनुसार इस ‘एनकाउंटर’ मे करीबन 60 लोगों की मौत हुई और 530 लोग घायल हुए। और भी चौकाने वाली बात यह है कि स्टीफन क्रैग पैडडॉक नाम का यह आतंकवादी एक अमरीकी गोरा आदमी था।

एल. वी. मे स्थित मेंडले होटल के बत्तीसवे मंजिले से पैडडॉक ने पास के लास वेगस गाँव मे आयोजित संगीत कार्यक्रम मे आये दर्शकों पर गोली चलानी शुरू कर दी। जब होटल के सुरक्षाकर्मियों ने पैडडॉक के कमरे मे घुसने की कोशिश की, तब उसने उन पर भी गोली चलायी। मुठभेड़ मे एक सुरक्षा कर्मी घायल हो गया। जब लास वेगस महानगर पुलिस डिपार्टमेंट के लोग पैडडॉक को गिरफ्तार करने आये, तो वे दंग रह गए। पैडडॉक ने पुलिस कर्मियों के कमरे मे घुसते ही ख़ुदकुशी कर ली। पुलिस कर्मियों ने पैडडॉक के कमरे से भारी मात्रा मे बन्दूक, पिस्तौल और गोलाबारूद बरामद किये जिसमे AK-47 राइफल भी शामिल थे। हालांकि पुलिस सूत्र पैडडॉक के इस आचरण का कारण नहीं बता पाएं हैं, पैडडॉक का आतंकवादी संगठनों के साथ संबंध को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा रहा है।

अमेरिका मे सामूहिक शूटिंग का यह अब तक का सबसे बड़ा केस है। इस हादसे से कई प्रश्न सामने आते हैं जिसके उत्तर हैरतंगेज़ हैं।

संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स और अपराध कार्यालय (UNODC) के रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका मे अन्य देशों की तुलना मे ज्यादा लोग मानव हत्या के शिकार होते हैं। ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी मे जहां 10 लाख लोगों की संख्या मे तकरीबन 2 लोग मानव हत्या द्वारा मारे जाते हैं, अमेरिका मे लगभग 30 लोग 10 लाख लोगों की संख्या मे मानव हत्या के शिकार होते हैं। दुनिया की 4.4 प्रतिशत आबादी अमेरिका मे रहती है।  विश्व मे असैनिक बन्दूक रखने वालों की मात्रा तकरीबन 70 करोड़ है जिसमे से 42 प्रतिशत बन्दूक्बाज़ अमेरिकी हैं। अमेरिकी रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (CDC) के अनुसार पिस्तौल और हथ्यार की आसान उपलब्धता से ज्यादा लोग ख़ुदकुशी करने के लिए प्रेरित होते हैं। केंद्र के एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 मे बन्दूक से जान लेने वालों की संख्या 20000 से भी ऊपर थी। वहीँ मानव-हत्या की संख्या 13000 थी। इन आंक्रों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है की अमेरिका मे लोगों की मानसिक स्थिति बिगड़ रही है।

यदि बन्दूक उपलब्धता मे भारत की बात की जाए, तो आज भी भारत मे बन्दूक विनियमन पर सरकार और सुरक्षा कर्मियों की कड़ी नज़र है। यदि आप भारत मे बन्दूक लेना चाहें, तो आपके कई महीनों तक लाइसेंस का इंतज़ार करना पड़ सकता है। लाइसेंस तीन वर्ग के अंतर्गत दिए जाते हैं – आत्मा रक्षा के लिए, स्पोर्ट्स टूर्नामेंट के लिए एवं फसल की सुरक्षा के लिए। इसके बावजूद वर्त्तमान काल मे देसी कट्टों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। चूँकि यह इम्पोर्टेड बन्दूक से सस्ते, टिकाऊ और आसानी से तैयार हो जाते हैं, उभरते लूटेरे और बदमाश इसका प्रयोग करते हैं।

बस्तर के आदिवासियों से लेकर तमिल नाडू के शिकारियों तक सभी देसी कट्टे का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। पश्चिम बंगाल और बिहार मे कई कारखाने देसी कट्टों के बिक्री से करोड़ों कमा रहे हैं। सुरक्षा कर्मियों को शक है कि प्रसिद्ध पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या मे इस्तेमाल किया गया 9 mm पिस्तौल भी इन्हीं कारखानों मे बना होगा। बिहार पुलिस के रिपोर्ट के अनुसार 2001 से 2017 तक पुलिस कर्मियों ने 40000 से भी ज्यादा देसी-कट्टे ज़ब्त किये और 600 गैरकानूनी बन्दूक कारखानों का लाइसेंस रद्द किया। रिटायर्ड आई.पी. एस ऑफिसर एस. आर दारापुरी के अनुसार यु.पी. मे निचले वर्ग के पुलिस कर्मी पैसे कमाने के चक्कर मे गुंडों और अन्य असमाजिक तत्वों को गोलियां भी बेचते हैं। यह प्रक्रिया विधान सभा चुनाव के समय बढ़ जाती है। कुछ और वरिष्ठ पुलिस कर्मी का यह भी कहना है की यु.पी. मे शायद ही ऐसा कोई ज़िला होगा जहां पर गैरकानूनी रूप से कट्टे ना बनाये जाते हों। कुछ लोग तो अपने घर के परिसर मे ही कट्टे बनाते हैं। यदि संजय लीला भंसाली अपनी फिल्म ‘गोलियों की रासलीला’ का दूसरा भाग बनाते हैं, तो यु.पी. से अच्छी  जगह शायद ही उन्हें मिले! भारत सरकार को इस समस्या का समाधान भी जल्द निकालना होगा।     

जब तक अमेरिकी कानून व्यवस्था बन्दूक की उपलब्धता पर कड़े रोक नहीं लगवायेगी, ऐसे ‘एनकाउंटर’ होते रहेंगे। आशा करते हैं की अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट, प्रशासन और सुरक्षा कर्मचारी साथ मिलकर इस समस्या का समाधान निकालेंगे।

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