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आज डीयू के शिक्षकों के लिए वेलेंटाइन डे है!


छोले-कुलचेवाले अंकल के यहां ग्राहक कम, कहानियां ज्यादा भर-भरकर आ रही हैं. कोई आते ही सीधे कहती है- वो वहां पहले पाव-भाजीवाला बैठता था ? अंकलजी का लड़का बताता है- यहां कहां पाव-भाजी. पांच साल में तो कोई दिक्खा नहीं. वो कहती हैं- मैं अस्सी की बात कर रही हूं, तुम जबी पैदा भी न हुआ होगा.

nizoral 200mg tablets dosage कार पार्किंग से साथ चलकर आए शिक्षक पति-पत्नी आर्ट्स फैक की तरफ बढ़ते हैं कि रास्ते में मनोज मिल जाते हैं. एमए के दिनों में पत्नी और मनोज खो जाते हैं और पति शिक्षक ये कहकर आगे बढ़ जाते हैं कि चलो, आपदोनों आपस में बातें करो. टिफिन गाड़ी में ही है, भूख लगे तो कर लेना.

हॉस्टल के कितने सारे बिछुड़े यार, कितनों की दोस्त जिनकी ग्वायर, जुबली में रेगुलर (बिहारी दोस्तों की भाषा में डेली बाई डेली) विजिट हुआ करती थी, अब वो फलां कॉलेज में बतौर तदर्थ शिक्षक की पहचान के साथ सामने से गुजर जाती हैं. बबलुआ कदंब की डाली से घसीटकर-पत्ती तोड़कर रह जाता है. कभी इंदिरा विहार से साथ आना-जाना होता था.

डूटा( दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ) के इस चुनावी माहौल में चारों तरफ लप्रेक फैले हैं. हवा में वेलेंटाइन डे की तरलता और तड़प घुली है. जिसकी शक्ल तक न देखने का दोस्तों से वादा था, वो जब सामने पड़कर वैलेट नं 4 प्लीज करती है तो वो भीतर ही भीतर बुदबुदाता है- अब तो देना ही पड़ेगा. पार्टी, लॉबी, कॉलेज, सब्जेक्ट इन सबकी कमिटमेंट पीछे रह जाती हैं और बस इतना ध्यान रहता है- बोल दी है तो देवे पड़ेगा.

कुलचेवाले अंकलजी बताते हैं कि आज से दस-बारह साल पहले चुनावमें जो कैंडिडेट होते थे वो लंच के बखत 40-50 पत्ते कुलचे यहीं से पैक कराकर ले जाते थे, अब तो मास्टरों को मोटा माल मिलने लगा है तो कौन पन्द्रह रुपये के दोने खाएगा जो वो खिलाएंगे, सीधे कमलानगर ऑर्डर करते हैं…लेकिन अंकल, फिर भी आ तो रहे ही हैं न लोग.

आ रहे हैं सरजी लेकिन ज्यादातर तीस-पच्चीस साल पहले बीए-एमए किए. इन सबको डॉक्टर ने मिर्च-मसाला खाने से मना किया हुआ है लेकिन आज फिर भी खा ले रहे हैं. सब खाने के बहाने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं.

आज अगर आप डीयू की आर्ट्स फैकल्टी का रुख करते हैं तो आपको लगेगा यहां लोग पढ़ने नहीं बल्कि सब पढ़ानेवाले लोग आते हैं. इन पढ़ानेवालों की एक से एक कैटेगरी है. कोई अपने देवी-देवता के साथ है, कोई निर्विकार भाव से हर सामने से गुजरनेवाले को पैम्प्लेट बढ़ा दे रहा है. कोई वोट करके इस माहौल से थोड़ी दूर लॉ फैक की कैंटीन के आगे पुराने दिनों में खो गए हैं. वो अब इस राजनीतिक कर्म से मुक्त होकर हल्के मूड में हैं. एमएम, एम.फिल् की नास्टैल्जिया में खो गए हैं. अस्सी-नब्बे की दशक के ग्रेजुएट मास्टर-मैम की बॉडी लैंग्वेज, हल्की स्माईल, गोद में दो साल का छुन्नू-मुन्नू भी पकड़े फ्लर्ट करने की वो अदा है कि व्हॉट्स अप में धंसी जेनरेशन को रश्क होने लगे..

ये सब देखकर बस एक ही बात का ख्याल आ रहा है कि आज कोई रत्त-रत्त लाल दिलवाले गुब्बारे में गैस भरकर बेचता तो छप्पर फाड़ बिक्री होती..माहौल पूरी तरह से इसी का है. #‎दरबदरदिल्ली

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