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अम्बेडकर और उनके जीवन से मिली सीख!

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भीमराव अम्बेडकर, ‘बाबा साहब’ और ‘भारतीय संविधान के पिता’ के रूप में जाने जाते हैं। महर जाति में पैदा होने के कारण, वह सामाजिक और आर्थिक भेदभाव के शिकार थे। लेकिन इसके बावजूद, उन्होंने एक शैक्षिक जीवन का पीछा किया और मुंबई विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय (यूएसए) से स्नातक हासिल कर भारत के पहले प्रसिद्ध और विद्वान् दलित बने। उनके जीवन और लेख मे दी गई सीख आज भी उनकी मृत्यु के 6 दशक बाद कई भारतीयों को प्रेरित करता आया है। कुछ अमूल्य सिद्धांत निचे दर्शाए गए हैं;

  • अम्बेडकर ने ‘वैदिक हिन्दू सिद्धांत’, जिसमे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मे विभाजित किया गया था, उसे खारिज करने का सुझाव दिया। उनका मानना था की इस प्रक्रिया मे अल्पसंख्यक कुलीन वर्ग ने हमेशा से ही बहुसंख्यक शुद्र और दलित वर्ग को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भेदभाव की बेड़ी मे रखा था। स्वतंत्र भारत मे अम्बेडकर इस व्यवस्था का नाश चाहते थे। इस प्रक्रिया की जगह उन्होंने ‘चार्वक सिद्धांत’ का चयन किया, जो कि बौद्ध धर्म की तरह जाति, भाषा और लिंग की परवाह किए बिना समानता की मांग करता था। अम्बेडकर खुद गौतम बुद्ध के विचार का समर्थन करते थे। ‘कर्म से ना की धर्म से इंसान महान होता है’ इस सोच से वे काफी प्रभावित हुए थे।
  • अम्बेडकर ने समस्तरीय जाती प्रथा की मांग की चूंकि उनका दृढ विश्वास था की इस प्रक्रिया मे सभी व्यक्तियों को गरिमा मिलेगी। उन्होंने अंतर-जाति और अंतर-धर्म विवाहों का भी समर्थन किया, क्योंकि वे मानते थे कि इनके ज़रिये लोग ‘जाति के मानसिक बाधाओं से बाहर आयेंगे’ और ‘एक दूसरे की आत्माओं’ से प्यार करेंगे। जाती, अम्बेडकर के अनुसार, सिर्फ एक मानसिक दृष्टिकोण थी जिसको बदलना आवश्यक था।
  • अम्बेडकर अछूतों सहित सभी के लिए सार्वभौमिक शिक्षा चाहते थे। अम्बेडकर अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाने के पक्ष मे थे जहां दलित मतदाता अपने दलित नेता का चुनाव करते। उन्होंने बड़ी झिझकता से आरक्षण का समर्थन किया क्योंकि वो जानते थे की कानूनी आरक्षण से भी ज़्यादा दलितों को सामाजिक समानता की ज़रुरत थी। अम्बेडकर ने एक ऐसे भारत की परिकल्पना की, जो समानता, न्याय और भाईचारे की कसौटी पर खरा उतरेगा और धार्मिक और कट्टरपंथी सोच का त्याग करेगा।

हालांकि, अम्बेडकर के असूल भारतीय संविधान के अंग हैं लेकिन इनकी वास्तविक उपलब्धि अब तक पूरी नहीं हुयी है। यह तभी होगी जब हर एक भारतीय एकता और बंधुता की नज़र से अपने साथी को देखेगा।

 

 

 

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