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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक सोच!


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आरंभ 28 फरवरी 1909 को अमेरिका के न्यू यॉर्क शहर मे हुआ था। सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमेरिका ने आंदोलन निकालते हुए महिलाओं के लिए सामान अधिकार की मांग की। आंदोलन की नेता थेरेसा मैलकीयल, जिसे महिला दिवस का निर्माता कहा जाता है, उन्हें यह विश्वास था की यदि समाज महिला को भी पुरुषों जैसे सम्मान और सहानुभूति दे, तो दुनिया एक अलग जगह होती। 109 वर्ष बाद, उनका सपना पूरा तो नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी काफी तरक्की की जा चुकी है।

pariet 5mg 60x वैश्विक लिंग अंतर रिपोर्ट 2017 के अनुसार, जहाँ पर विभिन्न देशों ने शिक्षा और स्वास्थय मे 95% और 96% तक पुरुष-महिला के बीच अंतर को कम किया है, वहीँ पर आर्थिक सहभागिता (58%) और राजनैतिक सशक्तिकरण (23%) को कम करने मे अब भी बहुत समय लगेगा। भारत इस सूची मे काफी पीछे है। 140 देशों मे से भारत शिक्षा के क्षेत्र मे 102वे, आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र मे 110वे और स्वास्थ्य के क्षेत्र मे 103वे स्थान पर है। भारत को अब भी बहुत काम करना है।

आंकड़ों से अब हम वास्तविकता पर ध्यान देते हैं। जहाँ पर भारत सरकार की मातृत्व योजना, जिसके अंतर्गत नयी माताओं को 6 महीने तक वैतनिक अवकाश मिलता है, सराहनीय है, वहीँ पर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-2016 के अनुसार केवल 68.4% महिलाएं शिक्षित हैं। जहाँ पर 2016 के रिओ ओलिंपिक खेलों मे महिलाओं ने भारत को गौरव दिलाया, वहीँ पर अब भी महिला क्रिकेट टीम की शोभा और तन्खा पुरुष खिलाड़ियों से कम है। उदहारण के तौर पर, पुरुष कप्तान विराट कोहली महिला कप्तान मिथाली राज से लगभग 6 करोड़ 50 लाख रुपये ज़्यादा कमाते हैं। सेना मे भी जहाँ पर हम 73 साल बाद महिलाओं को लड़ाकू विमानों मे भाग लेने की अनुमति दे रहे हैं, वहीँ पर स्पेशल फोर्सेज की सदस्यता देने मे हिचकिचाते हैं।

जिस प्रकार मुझे एक भारतीय मुस्लिम महिला बॉडीबिल्डर की खबर सुनकर प्रसन्नता मिलती है, वहीँ एक मुस्लिम महिला इमाम द्वारा नमाज़ का बुलावा देने पर उसके बहिष्कार होने पर महसूस होता है कि हम काबिलियत ना की लिंग पर कब तक ध्यान देते रहेंगे? एक अलग दृष्टिकोण की खोज मे मैं एक नए सीरियल से वाकिफ हुआ। ऑल्ट बालाजी की शो ‘द टेस्ट केस‘ महिला सशक्तिकरण की एक अध्बुध कहानी है। मेरी पाठकों से विनती है की वे इसे ज़रूर देखें। आपका नज़रिया ज़रूर बदलेगा।

हमारी सरकार, सेना और समाज द्वारा उठाया गए कुछ सकारात्मक योजनाएं प्रशंसनीय हैं, लेकिन अब भी मंज़िल दूर है और हमे और काम करना है। महिला दिवस सिर्फ एक दिन की बात नहीं है, यह एक सोच है जिससे हमे अपने ज़हन मे उतारना पड़ेगा। तभी वास्तविक बदलाव दिखेगा।

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