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अंतर्द्वंद्व

जगातीय जुस्तजू के बीच
एक कशमकश मेरे भीतर भी चले |
इन द्वंद्वों से जन्म लेता है
मन में अंतर्द्वंद्व |
पनपती है कसक सी
और उभरता है
एक प्रश्न |
फूल की कमनीयता को
शूल से बींधता है बार-बार
भला कौन?

foam-roller-massage-for-beach-running-oceanside7-female-silhouette-475आखिर क्या है जीवन?
बाहर से अनोखा ?
अन्दर से खोकला ?
मशहूर होकर भी
इस कदर क्यों बदनाम है ?
जीतकर सब कुछ
भीख की मांग में क्यों फिरे ?
पीकर जल भंडार भी
तृष्णा कैसी ये
मिटती ही नहीं |
सूरज की आभा
और बीतते काल के साथ
मेरा साया
मुझसे ही
कभी लम्बा
कभी छोटा है |

हर दिन दिवाकर डूबकर
सांझ को लाये
जो ठहरे हुए
मील के पत्थर की तरह
क्षणिक शान्ति की शरण में
देती एक अवसर
आत्मावलोकन के लिए
ताकि स्पष्ट हो सकें कुछ द्वंद्व
जो हर पल आत्मा को  कचोडते हैं
और प्रत्येक उषा में
एक चेतना का शव देखते हैं |

field,girl,summer,sunlight,cool,freedom-fb8641fa231ee1cbdd389e2f773a1b3b_hशून्य से शून्य तक
रोज़ ही मैं
सफ़र करती हूँ
और जब सिफ़र में मुड़कर
देखने के लिए रूकती  हूँ
सहसा….दौड़ पड़ती हूँ
जीवन की लक्ष्यहीन
अंधी दौड़ में
इस डर से कि
पिछड न जाऊं औरों से |
आगे-आगे ही पाऊँ बढ़ते जाते  हैं
दिशाहीन होकर
किसी अनजानी सफलता कि ओर |

मेरी परछाई
शाम के साए में ढलकर
मुड जाती है मुझसे पहले
और संकेत देती है मुझे
उस खाई की
जिसमें मेरा आत्म-पतन निहीत है,
निश्चित है |
आत्म-निरीक्षण के
इस अंतर्द्वंद्व में
एक और शाम ढल जाती है
और दिखा जाती है
एक अंधकार
जिसमें कोमल संवेदना
दम तोड़ देगी |

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